हमारी जिह्वा में सत्यता हो, चेहरे में प्रसन्नता हो

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हमारी जिह्वा में सत्यता हो, चेहरे में प्रसन्नता हो और हृदय में पवित्रता हो तो इससे बढ़कर सुखद जीवन का और कोई अन्य सूत्र नहीं हो सकता।

निश्चित समझिए असत्य हमें भीतर से कमजोर बना देता है। जो लोग असत्य भाषित करते हैं उनका आत्मबल बड़ा ही कमजोर होता है। जो लोग अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं वही सबसे अधिक असत्य का भाषण करते हैं। हमें सत्य का आश्रय लेकर एक जिम्मेदार व्यक्ति बनने का सतत प्रयास करना चाहिए।

उदासी में किये गये प्रत्येक कर्म में पूर्णता का अभाव पाया जाता है। हमें प्रयास करना चाहिए कि प्रत्येक कर्म को प्रसन्नता के साथ किया जाना चाहिए। जीवन हमें उदासी और प्रसन्नता दोनों विकल्प प्रस्तुत करता है। अब ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हमें क्या पसंद है। हम क्या चुनना चाहते हैं...?

निष्कपट और निर्बैर भाव ही हृदय की पवित्रता है। जीवन में अगर कोई बहुत बड़ी उपलब्धि है तो वह पवित्र हृदय की प्राप्ति है। पवित्र हृदय से किये गये कार्य भी पवित्र ही होते हैं।

                     प्रभु स्वयं कहते हैं,
              निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
             मोहि कपट छल छिद्र ना भावा।

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