देनहार कोई और है

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*देनहार कोई और है.. .....*

एक राजा बहुत बड़े दानवीर थे।
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उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे।
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ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये राजा कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।
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ये बात जब तुलसीदासजी तक पहुँची तो उन्होंने राजा को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था..
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*ऐसी देनी देन जु कित सीखे हो सेन।*
*ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ त्यों त्यों नीचे नैन।।*
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इसका मतलब था कि राजा तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो ? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं ?
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राजा ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो राजा का कायल हो गया।
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इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।
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राजा ने जवाब में लिखा...
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*देनहार कोई और है भेजत जो दिन रैन।*
*लोग भरम हम पर करैं तासौं नीचे नैन।।*
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मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है।
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परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।
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*वो ही करता और वो ही करवाता है,*
*क्यों बंदे तू इतराता है,*
*एक साँस भी नही है तेरे बस की,*
*वो ही सुलाता और वो ही जगाता है..*
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