अति सुन्दर मार्मिक कहानी

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*🌹👉🏿अति सुन्दर मार्मिक कहानी* 🌹

एक मन्दिर था ।
उसमें सब लोग पगार पर थे।
आरती वाला,
पूजा कराने वाला आदमी,
घण्टा बजाने वाल भी पगार पर था...
घण्टा बजाने वाला आदमी आरती के समय भाव के साथ इतना मसगुल हो जाता था कि होश में ही नही रहता था।

घण्टा बजाने वाला व्यक्ति पूरे भक्ति भाव से खुद का काम करता था, मन्दिर में आने वाले सभी व्यक्ति भगवान के साथ साथ घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के भाव के भी दर्शन करते थे,उसकी भी वाह वाह होती थी...

एक दिन मन्दिर का ट्रस्ट बदल गया,और नये ट्रस्टी ने ऐसा आदेश  जारी किया कि अपने मन्दिर में  *काम करने वाले सब लोग पढ़े लिखे होना जरूरी है जो पढे लिखे नही है उन्हें निकाल दिया जाएगा.*

उस घण्टा बजाने वाले भाई ने ट्रस्टी से कहा कि  'तुम्हारे आज तक का पगार ले लो,अब से तुम नौकरी पर मत आना।

उस घण्टा बजाने वाले व्यक्ति ने कहा, "साहेब भले मै पढ़ा लिखा नही हुँ,परन्तु इस कार्य मैं मेरा भाव भगवान से जुड़ा हुआ है देखो!"

ट्रस्टी ने कहा,"सुन लो, तुम पढ़े लिखे नही हो, इसलिए तुम्हे नहीं रखा  जाएगा..."

दूसरे दिन मन्दिर में नये लोगो को रखने में आया. परन्तु आरती में आये लोगो को अब पहले जैसा आनन्द आता नही था. घण्टा बजाने वाले व्यक्ति की सभी को कमी महसूस होती थी.

कुछ लोग मिलकर घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के घर गए, और विनती करी, तुम मन्दिर आओ ।

उस भाई ने जवाब दिया, "मैं आऊंगा तो ट्रस्टी को लगेगा नौकरी लेने के लिए आया हूँ इसलिए आ नहीं सकता हूँ।

वहां आये हुए लोगो ने एक उपाय बताया कि  'मन्दिर के बराबर सामने आपके लिए एक दूकान खोल के देते है. वहाँ आपको बैठना है और आरती के समय घण्टा बजाने आ जाना, फिर कोई नही कहेगा तुमको नौकरी की जरूरत है ..."

उस भाई ने मन्दिर के सामने दूकान शुरू की वो इतनी चली  कि एक दूकान से सात दूकान  और साथ दूकान से एक फेक्ट्री खोली।

अब वो आदमी मर्सिडीज़ से घण्टा बजाने आता था ।

समय बीतता गया ये बात पुरानी सी हो गयी।

मन्दिर का ट्रस्टी फिर बदल गया .

नये ट्रस्ट को नया मन्दिर बनाने के लिए दान की जरूरत थी

मन्दिर के नये ट्रस्टी को विचार आया, सबसे पहले उस फेक्ट्री के मालिक से बात करके देखते है ..

ट्रस्टी मालिक के पास गया 60 लाख का खर्चा है, फेक्ट्री मालिक को बताया।

फैक्ट्री के मालिक ने कोई सवाल किये बिना एक खाली चेक ट्रस्टी के हाथ में दे दिया और कहा चैक भर लो ट्रस्टी ने चैक भरकर उस फैक्ट्री मालिक को वापस दिया । फैक्ट्री मालिक ने चैक को देखा और उस ट्रस्टी को दे दिया।

ट्रस्टी ने चैक हाथ लिया और कहा कि दस्तखत तो बाकी है"

मालिक ने कहा मुझे दस्तखत करना नही आता है, लाओ अंगुठा मार देता हुँ, "वही चलेगा ..."

*ये सुनकर ट्रस्टी चौंक गया और कहा, "साहेब तुम अनपढ़ होकर भी इतनी तरक्की की,यदि पढे लिखे होते तो कहाँ होते ...!!!"

तो वह सेठ हँसते हुए बोला,
*"भाई, मैं पढ़ा लिखा होता तो बस मन्दिर में घण्टा बजा रहा होता"*

भावार्थ 
कार्य कोई भी हो, परिस्थिति कैसी भी हो, तुम्हारी लियाकत तुम्हारी  भावनाओ पर निर्भर करता है ।
भावनायें शुद्ध होगी तो  ईश्वर और सुंदर भविष्य पक्का तुम्हारा साथ देगा ।
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